उद्यमी के कार्य | Functions of Entrepreneur Establishment

Neeraj Kabir
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 उद्यमी के कार्य | Functions of Entrepreneur Establishment 

उद्यमी के कार्य | Functions of Entrepreneur Establishment


उद्यमी को उपक्रम की स्थापना से लेकर वस्तुओं के विक्रय तक विभिन्न प्रकार के कार्य करने होते हैं। किन्तु उद्यमी के कार्य वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण तक ही सीमित नहीं है, उसे अपने समाज एवं राष्ट्र के विकास के सम्बन्ध में भी अनेक कार्य करने होते हैं। वह समाज में व्यावसायिक क्रियाओं की पहल करता है, आर्थिक गतिशीलताओं को जन्म देता है तथा सामाजिक रूपान्तरण की अनेक क्रियाओं को सम्पादित करता है। अत: उद्यमी के कार्य व्यापक एवं चुनौतीपूर्ण होते हैं। उद्यमी के कई कार्य आर्थिक विकास के स्तर, मानवीय एवं भौतिक संसाधनों के विकास, सामाजिक स्थिति, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं आदि पर भी निर्भर करते हैं। इस प्रकार उद्यमी के कुछ कार्य समय, स्थान एवं परिस्थितियों के अनुसार निम्न प्रकार हो सकते हैं। 


स्थापना सम्बन्धी कार्य (Establishment Functions)

उद्यमी का सर्वप्रथम कार्य अपने उपक्रम का प्रवर्तन करना होता है। उपक्रम के प्रवर्तन एवं उसकी स्थापना करते समय उद्यमी को अनेक कार्य करने होते हैं। इनमें प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं । 

1. व्यावसायिक विचार' की कल्पना करना (To imagine a Business Idea )

उद्यमी पर्याप्त कल्पनाशक्ति एवं विचारशीलता के द्वारा किसी सृजनात्मक विचार की खोज करता है। वह अपने मौलिक एवं व्यावहारिक विचारों से किसी उपक्रम या उद्योग की स्थापना की कल्पना करता है। प्रत्येक समाज में व्यक्तियों के विकास के अनेक अवसर होते हैं। साहसी आर्थिक एवं व्यावसायिक क्षेत्रों में किसी 'लाभप्रद विचार' की खोज करता है।

2. 'विचार' की जाँच-पड़ताल एवं मूल्यांकन (Investigation of the Proposition)

प्रारम्भिक विचार बन जाने के बाद उद्यमी अपने प्रस्ताव की 'व्यावहारिकता' का मूल्यांकन करता है। विचार की व्यावहारिकता को जाँचने के लिए साहसी निम्न बातों पर विचार करता है |

(i) सरकारी नीति- औद्योगिक नीति, लाइसेन्सिंग नीति, व्यापारिक नीति, वित्तीय नीति आदि 

(ii) साधनों की उपलब्धता- भौतिक, मानवीय एवं वित्तीय साधन, जैसे- श्रम, यन्त्र, माल, पूँजी, तकनीक, बाजार आदि।

(iii) योग्यता एवं कौशल- तकनीकी योग्यता का स्तर, प्रबन्धकीय सेवाएँ, संगठन योग्यता आदि। 

(iv) उत्पादन व वितरण व समस्याएँ - उपक्रम की स्थिति चयन, संयन्त्र, अभिन्यास, आकार, शक्ति पूर्ति, परिवहन, गोदाम आदि।

(v) लाभप्रदता- लागत, माँग, प्रतियोगिता का स्तर आदि ।

उद्यमी उपरोक्त घटकों पर विचार करके अपने प्रस्ताव की लाभप्रदता एवं व्यावहारिकता की जाँच करता है। 

(3) परियोजना नियोजन (Project Planning)

व्यावसायिक उपक्रम की सफलता के लिए प्रभावी नियोजन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में उद्यमी निम्न निर्णय लेता है-

(i) उत्पादन नियोजन- वस्तु की किस्म, डिजाइन, आकार, विशेष तत्व, हिस्से-पुर्जे, पैकिंग, रंग, ब्राण्ड, लेबल आदि।

(ii) संयन्त्र एवं उत्पादन नियोजन- संयन्त्र स्थल, संयंत्र अभिन्यास, प्लान्ट भवन, यंत्रोपकरण वसेवाएँ, उत्पादन प्रणाली, तकनीक, उत्पादन का पैमाना आदि।

(iii) लागत नियोजन- कच्चे माल, मजदूरी, प्रत्यक्ष खर्च, कारखाना व्यय, कार्यालय व्यय, बिक्री विज्ञापन आदि के आरम्भिक अनुमान ।

(iv) वित्तीय नियोजन- पूँजी की मात्रा, पूँजी स्त्रोत, पूँजी संरचना आदि ।

(v) संगठनात्मक नियोजन- संस्था का आकार, संगठन स्वरूप, व्यावसायिक सहयोग, लक्ष्य आदि।

(vi) विपणन नियोजन - मध्यस्थ, बाजार, मूल्य, विज्ञापन, विक्रय संवर्द्धन आदि ।

4. परियोजना का अनुमोदन करना (Getting the approval of project ) 

उद्यमी उपक्रम का पंजीयन करवाने, आवश्यक अनुमति, स्वीकृति एवं लाइसेंस प्राप्त करने, विभिन्न सुविधाएँ एवं प्रेरणाएं प्राप्त करने, बैंक एवं वित्तीय संस्थाओं से वित्त प्राप्त करने आदि के लिए सम्बन्धित संस्थाओं व विभागों में परियोजना प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है। इस प्रकार, विभिन्न संस्थाओं को परियोजना प्रतिवेदन प्रस्तुत करने तथा उसे अनुमोदित करवाने की प्रक्रिया को 'परियोजना का विक्रय' (Selling the Project) भी कहा जाता है।

5. उपक्रम स्थापित करना (Establishing Enterprise)

इस अवस्था में उद्यमी पूर्व निर्धारित परियोजना के अनुसार उपक्रम स्थापित करने हेतु विभिन्न कार्यवाहियाँ करता है। आधुनिक युग में उपक्रमों की स्थापना सामान्यतः औद्योगिक बस्तियों (Industrial Estates) में की जाती है। इन औद्योगिक बस्तियों एवं क्षेत्रों में उद्योग की सभी आधारभूत सुविधाएँ विद्यमान होती है। अतः साहसी निर्धारित स्थान पर संयन्त्र का निर्माण कार्य करवाता है तथा आवश्यक साधनों व सुविधाओं की व्यवस्था करता है।

Neeraj Kumar

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